Saturday, 29 November 2014

स्कॉटलैंड में स्वतंत्रता हेतु जनमत संग्रह

यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एंड नॉर्दर्न आयरलैंड जिसे संक्षेप में यूनाइटेड किंगडम या यूके भी कहा जाता है, यूरोप स्थित एक संप्रभु राष्ट्र है जो यूरोपीय मुख्यभूमि के उत्तर-पश्चिम में दो बड़े द्वीपों और अनेक छोटे-छोटे द्वीपों में विस्तृत है। ये द्वीप अटलांटिक महासागर और उत्तरी सागर में स्थित हैं। संयुक्त रूप से इन द्वीपों को ब्रिटिश द्वीपसमूह कहा जाता है। यूके के अंतर्गत इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड नामक देश सम्मिलित हैं जो स्वायत्त होते हुए भी स्वतंत्र या संप्रभु नहीं हैं। इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स ग्रेट ब्रिटेन नामक द्वीप के भाग हैं जबकि उत्तरी आयरलैंड, आयरलैंड द्वीप का एक भाग है। आयरलैंड द्वीप का शेष भाग आयरलैंड गणतंत्र के रूप में एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र है। यूके को ही बोलचाल की भाषा में ब्रिटेन भी कहा जाता है। इंग्लैंड की राजधानी लंदन, स्कॉटलैंड की एडिनबरा, वेल्स की कार्डिफ तथा उत्तरी आयरलैंड की राजधानी बेलफास्ट है जबकि यूके की राष्ट्रीय राजधानी लंदन है। वर्ष 1536 में वेल्स तथा 1707 में स्कॉटलैंड इंग्लैंड के साथ संयुक्त हुए तथा 1801 में आयरलैंड के सम्मिलित होने के बाद इस संयुक्त राजनीतिक इकाई का नाम यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड पड़ा। परंतु वर्ष 1922 में आयरलैंड द्वीप का एक बड़ा भाग अलग होकर आयरलैंड गणतंत्र के नाम से संप्रभु राष्ट्र बन गया और वेल्स, स्कॉटलैंड तथा उत्तरी आयरलैंड की संयुक्त इकाई का वर्तमान नाम अस्तित्व में आया। एक जमाने में यूके के साम्राज्य (ब्रिटिश साम्राज्य) का विस्तार पृथ्वी के भू-क्षेत्र के लगभग एक-चौथाई भाग तक विस्तृत था परंतु द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में धीरे-धीरे ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य अस्त होता गया और उसकी संप्रभुता का विस्तार केवल ब्रिटिश द्वीपसमूह और छोटे-मोटे अन्य समुद्रपारीय क्षेत्रों तक ही सीमित रह गया। इसे इतिहास की विडंबना ही कहा जा सकता है कि हाल ही में स्वयं यूके ही बिखराव के कगार पर खड़ा नजर आया जब स्कॉटलैंड में स्वतंत्रता की मांग ने जोर पकड़ते हुए जनमत संग्रह तक का मुकाम तय कर लिया।

18 सितंबर, 2014 को स्कॉटलैंड में यूके से स्वतंत्रता के प्रश्न पर जनमत संग्रह कराया गया जिसमें 55.3 प्रतिशत मतदाताओं ने यूके में बने रहने के पक्ष में मत व्यक्त किया।

इस जनमत संग्रह में यह प्रश्न पूछा गया था कि क्या स्कॉटलैंड को एक स्वतंत्र देश होना चाहिए जिसके प्रत्युत्तर में हां (यस) या नहीं (नो) का चुनाव मतदाताओं द्वारा किया जाना था।

कुल 1,617,989(44.7%) मतदाताओं ने ‘यस’ तथा 2,001,926 (55.3%) मतदाताओं द्वारा ‘नो’ विकल्प का चयन किया गया।
जनमत संग्रह में कुल मतदाताओं के 84.5% द्वारा प्रतिभाग किया गया था।
जनमत संग्रह हेतु 16 वर्ष या उससे अधिक आयु के सभी स्कॉटलैंड के निवासी मत देने के पात्र थे जिनमें कतिपय अपवादों को छोड़कर यूरोपीय संघ और राष्ट्रमंडल के नागरिक भी शामिल थे।

उल्लेखनीय है कि स्कॉटिश नेशनलिस्ट पार्टी (एसएनपी) और स्कॉटलैंड के अन्य दलों द्वारा स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता की मांग की जा रही थी।
2011 के चुनावों में स्कॉटलैंड की संसद में एसएनपी को बहुमत मिलने के बाद इस दिशा में प्रयास तेज हुए तथा ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरून तथा एसएनपी नेता एवं स्कॉटलैंड के नए प्रथम मंत्री एलेक्स सामंड के बीच अक्टूबर, 2012 में समझौता हुआ।

इस समझौते को स्कॉटलैंड की राजधानी एडिनबरा के नाम पर एडिनबरा समझौता कहा गया तथा इसी के अनुरूप जनमत संग्रह संपन्न हुआ।
यूके की तीन प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों; कंजर्वेटिव पार्टी, लेबर पार्टी तथा लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी द्वारा ‘नो’ पक्ष का समर्थन किया गया।
अंतिम दौर में ‘यस’ पक्ष के समर्थन में भारी माहौल बनने के बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री कैमरून और अन्य प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं द्वारा सघन प्रचार और अधिक स्वायत्तता के वादों की मदद ली गई।

उल्लेखनीय है कि यूके में स्कॉटलैंड, उत्तरी आयरलैंड और वेल्स की अपनी संसदें हैं जो स्थानीय विषयों पर कानून बना सकती हैं जबकि इंग्लैंड के विषय में विधिनिर्माण यूके की संसद द्वारा ही किया जाता है।

जनमत संग्रह के तुरंत बाद ब्रिटेन की कंजरवेटिव पार्टी द्वारा इंग्लैंड के विषयों पर केवल इंग्लैंड से चुने सांसदों को ही वोट देने के अधिकार की मांग की गई जिसका लेबर पार्टी द्वारा विरोध किया जा रहा है।

इंग्लैंड के आकार और जनसंख्या में बड़ा होने के कारण यूके की राजनीति पर उसका ही वर्चस्व रहा है।

जनमत संग्रह की मांग और ‘यस’ वोट के पक्ष में अपेक्षाकृत अधिक जनसमर्थन प्राप्त हुआ जबकि यूके और स्कॉटलैंड के अधिकतर समाचारपत्रों और मीडिया द्वारा ‘नो’ का पक्ष लिया गया था।

‘नो’ पक्ष के अनुसार अलग हो जाने पर स्कॉटलैंड की मुद्रा, वहां कल्याणकारी नीतियों के जारी रह पाने, संसाधनों की उपलब्धता, यूरोपीय संघ के साथ संबंधों तथा अंतर्राष्ट्रीय मंचों और संबंधों में उसकी हैसियत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता।
जबकि ‘यस’ पक्ष के समर्थकों के अनुसार केंद्रीय संसद और सरकार द्वारा थोपी नीतियों के चलते स्कॉटलैंड की औद्योगिक स्थिति खराब हुई तथा उत्तरी सागर स्थित तेल के कुंओं पर संप्रभुता प्राप्त होने से स्वतंत्र स्कॉटलैंड द्वारा अपनी कल्याणकारी नीतियों हेतु अधिक संसाधन उपलब्ध हो सकेंगे।

उल्लेखनीय है कि 2008 की आर्थिक मंदी और तत्पश्चात की कंजरवेटिव सरकार की खर्च में कटौती करने की नीति से स्कॉटलैंड में भारी रोष था।

यद्यपि प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों द्वारा स्कॉटलैंड को अधिक वित्तीय स्वायत्तता देने के वादे किए गए हैं परंतु आपसी मतभेदों के चलते उनके पूरा हो पाने पर संशय है।
यूके में हुए जनमत संग्रह पर यूरोप की तीक्ष्ण दृष्टि थी क्योंकि स्कॉटलैंड के स्वतंत्र हो जाने के पश्चात यूरोप में स्पेन, बेल्जियम और कई अन्य देशों में इस प्रकार की मांगें उठने का खतरा था।

यद्यपि ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने कहा है कि स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता का प्रश्न इस पीढ़ी के लिए हल हो चुका है, पर ‘यस’ के समर्थन में चले अभूतपूर्व जनांदोलन ने स्कॉटलैंड की नई पीढ़ी को नई राजनीतिक चेतना से लैस कर दिया है जिससे यूके की भावनात्मक एकता अब पहले जैसी नहीं रहेगी।


Courtesy Ghatnachakra

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